अध्याय-11 मानव नैत्र तथा रंग-बिरंगा संसार

  

अध्याय-11 मानव नैत्र तथा रंग-बिरंगा संसार 



मानव नैत्र-
मानव नैत्र एक केमरे की भांति होता है । नैत्र का लैंस एक प्रकाश सुग्राही परदे पर या दृष्टिपटल पटल(रेटिना) पर प्रतिबिंब बनाता है । इसके निम्न भाग होते है –

1. कॉर्निया-
इसे स्वछ्चमंडल भी कहते है । यह पारदर्शी झिल्ली होती है ,जिसमें से प्रकाश नेत्र में प्रवेश करता है । नेत्र में प्रवेश करने वाली अधिकांश प्रकाश किरणों का अपवर्तन कॉर्निया के बाहरी पृष्ठ पर हो जाता है । कॉर्निया में रक्त कोशिकाएँ नहीं होती है ,इसी कारण इसका प्रत्यारोपण सर्वाधिक सरल है ।
2. जल द्रव-
कॉर्निया के पीछे एक छोटा कोष्ठ होता है जिसमें पारदर्शी द्रव भरा होता है । इसे जल द्रव कहते है ।
3. काचाभ द्रव-
लैंस के पीछे एक बड़ा कोष्ठ होता है जिसे विट्रस चैम्बर(कोष्ठ) कहते है , जिसमें भरा द्रव काचाभ द्रव कहलाता है ।
4. परितारिका( आइरिस)-
इसे आइरिस भी कहते है । इसके बीच में एक छोटा सा छिद्र होता है जिसे पुतली(प्युपिल अथवा नेत्र तारा) कहते है । पुतली आवश्यकता अनुसार छोटी या बड़ी होती रहती है । अधिक प्रकाश पड़ने पर आइरिस फैल जाती है तथा पुतली छोटी हो जाती है ।

कम प्रकाश पड़ने पर आइरिस सिकुड़ जाती है तथा पुतली बड़ी हो जाती है । इस प्रकार पुतली नेत्र में प्रवेश करने वाली प्रकाश की मात्रा का नियंत्रण करती है ।

5. नेत्र लैंस-
नेत्र लैंस सिलियरी (पक्ष्माभी) मांस पेशियों की सहायता से लटका रहता है । यह क्रिस्टलीय तथा पारदर्शी होता है । यह केवल विभिन्न दूरियों पर रखी वस्तुओं को रेटिना पर फोकसित करने के लिए आवश्यक फोकस दूरी में सूक्ष्म समायोजन करता है । यह रेटिना पर किसी वस्तु का उल्टा तथा वास्तविक प्रतिबिंब बनाता है ।
6. दृष्टिपटल(रेटिना)-
इसे रेटिना भी कहते है । इसमें उपस्थित प्रकाश सुग्राही कोशिकाएँ प्रदीप्त होने पर सक्रिय हो जाती है और विद्युत सिग्नल उत्पन्न करती है । ये सिग्नल दृक तंत्रिका के द्वारा मस्तिष्क तक पहुँचते है जहाँ इनका संसोधन होता है और उपयुक्त संकेत मिलने पर वस्तु दिखाई देती है ।
⦁ मानव नेत्र द्वारा प्रतिबिंब बनना-


नेत्र के सामने स्थित किसी वस्तु से चलने वाली प्रकाश की किरणें पहले जलीय द्रव ,फिर नेत्र लैंस तथा अन्त में काचाभ द्रव से अपवर्तित होकर रेटिना पर टकराती है । चूंकि मानव नेत्र एक उत्तल लैंस की भांति होता है । अतः रेटिना पर बनने वाला प्रतिबिंब उल्टा तथा वास्तविक होता है । इस प्रतिबिंब का संकेत दृक तंत्रिकाओं के द्वारा मस्तिष्क तक पहुँचता है और मस्तिष्क इनका संसोधन करता जिससे रेटिना पर बना प्रतिबिंब ,मस्तिष्क द्वारा अनुभव के आधार पर मानव को सीधा दिखाई पड़ता है ।
⦁ नेत्र की समंजन क्षमता(power of accomodation of eye)-
नेत्र की आवश्यकतानुसार ,नेत्र लैंस की फोकस दूरी बदलने की क्षमता को नेत्र की समंजन क्षमता कहते है ।
उम्र के साथ-साथ आँख की समंजन क्षमता घटती जाती है क्योंकि उम्र बढ़ने पर नेत्र की नम्यता (flexibility) कम हो जाती है ।

⦁ आँख का दूर बिंदू(F)-
आँख से अधिकतम दूरी पर स्थित वह बिंदू जिस पर रखी वस्तु को आँख स्पष्ट रूप से देख सके ,आँख का दूर बिंदू कहलाता है । स्वस्थ आँख के लिए यह बिंदू अनंत पर होता है ।
⦁ आँख का निकट बिंदू(N)-
आँख से न्यूनतम दूरी पर स्थित वह बिंदू जिस पर रखी वस्तु को आँख स्पष्ट रूप से देख सके ,आँख का निकट बिंदू कहलाता है । स्वस्थ आँख के लिए यह 25 cm. होता है । इस दूरी को स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी कहते है ।
⦁ दृष्टि विस्तार-
निकट बिंदू(N) तथा दूर बिंदू(F) के बीच की दूरी को ही दृष्टि विस्तार कहते है । स्वस्थ आँख के लिए यह 25 cm. से अनंत दूरी तक होता है ।
⦁ मोतियाबिंद(Cataract)-
कभी-कभी अधिक आयु के कुछ व्यक्तियों के नेत्र का क्रिस्टलीय लैंस दूधिया या धुँधला हो जाता है ,इस स्थिति को ही मोतियाबिंद कहते है । इसके कारण नेत्र की दृष्टि में कमी या पूर्ण रूप से क्षय हो जाता है । मोतियाबिंद की शल्य चिकित्सा के पश्चात दृष्टि का वापस लौटना संभव है ।
⦁ नेत्र दोष एवं उनके निवारण-
1. निकट दृष्टि दोष(Myopia)-
इस दोष में मनुष्य निकट की वस्तु को तो स्पष्ट देख लेता है परन्तु एक निश्चित बिन्दू के बाद, वह दूर की वस्तु को स्पष्ट नहीं देख पाता है अथवा दिखाई नहीं देती है ।
कारण- इस दोष के निम्न कारण है-
i) नेत्र लैंस की वक्रता बढ़ जाए जिससे उसकी फोकस दूरी कम हो जाती है ।
ii) नेत्र गोलक व्यास बढ़ जाए अथवा नेत्र गोलक लंबा हो जाए जिससे नेत्र लैंस व रेटिना के बीच की दूरी बढ़ जाती है ।
अतः अनन्त से चलने वाली प्रकाश की किरणें इस दोष युक्त नेत्र लैंस से अपवर्तित होकर रेटिना से पहले ही अथवा रेटिना के निकट किसी बिन्दू P पर फोकस हो जाती है अथवा मिलती है ।

इस दोष युक्त नेत्र का दूर बिन्दू (F) अनन्त से खिसकर कम दूरी पर स्थित हो जाता है ।

निवारण-
निकट दृष्टि दोष को दूर करने के लिए ऐसे अवत्तल लैंस युक्त चश्में को आँख के सामने रख देते है जिससे अनन्त से आने वाली प्रकाश किरणें अपवर्तन के पश्चात रेटिना पर फोकस हो जाती है अथवा रेटिना पर मिलती है । जिससे प्रतिबिंब रेटिना पर बनता है ।

2. दूर दृष्टि दोष (Hypermetropia)-
दूर दृष्टि दोष मानव नेत्र का वह दोष है जिसमें मनुष्य दूर स्थित वस्तु को तो स्पष्ट देख सकता है परन्तु उसे पास में रखी वस्तु स्पष्ट दिखाई नहीं देती है ।
कारण- इसके निम्न कारण है-
i) नेत्र लैंस की वक्रता कम हो जाए जिससे उसकी फोकस दूरी बढ़ जाती है ।
ii) नेत्र गोले का व्यास कम हो जाए अथवा नेत्र गोलक छोटा हो जाए जिससे नेत्र लैंस व रेटिना के बीच की दूरी कम हो जाती है ।
अतः निकट बिन्दू से चलने वाली प्रकाश किरणें इस दोष युक्त नेत्र लैंस से अपवर्तित होकर रेटिना के पश्चात किसी बिन्दू S पर मिलती है ।

इस दोष युक्त नेत्र का निकट बिन्दू (N) निकट से हटकर अधिक दूरी पर स्थित हो जाता है ।

निवारण-
दूर दृष्टि दोष को दूर करने के लिए ऐसे उत्तल लैंस युक्त चश्में को आँख के सामने रख देते है जिससे निकट से आने वाली प्रकाश किरणें अपवर्तन के पश्चात रेटिना पर फोकस हो जाती है अथवा रेटिना पर मिलती है । जिससे प्रतिबिंब रेटिना पर बनता है ।

3. जरा दृष्टि दोष-
आयु बढ़ने के साथ-साथ नेत्र की समंजन क्षमता कम हो जाती है जिसके परिणाम स्वरूप आँख का दूर बिन्दू नेत्र के निकट तथा आँख का निकट बिन्दू नेत्र से दूर विस्थापित हो जाता है । इसलिए नेत्र न तो अधिक दूरी वाली वस्तु को और न ही बहुत पास वाली वस्तुओं को स्पष्ट देख पाता है । नेत्र का यह दोष जरा दृष्टि दोष कहलाता है ।
कारण-
जरा दृष्टि दोष का मुख्य कारण आयु बढ़ने के साथ-साथ नेत्र की समंजन क्षमता कम हो जाना है ।
निवारण-
जरा दृष्टि दोष के निवारण के लिए व्यक्ति को द्विफोकस लैंसों से युक्त चश्में का प्रयोग करना पड़ता है । इन लैंसों का ऊपरी भाग अवत्तल लैंस की तरह तथा नीचे का भाग उत्तल लैंस की तरह कार्य करता है ।


 प्रिज्म से प्रकाश का अपवर्तन-

चित्रानुसार ABC काँच का एक प्रिज्म है । इसके तल AB तथा AC पर प्रकाश का अपवर्तन दर्शाया गया है । माना एक प्रकाश किरण चित्रानुसार प्रिज्म के पृष्ठ AB पर कोण i (आपतन कोण) पर आपतित तथा कोण r (अपवर्तन कोण) पर अपवर्तित होती है । यह अपवर्तित किरण पुनः प्रिज्म के पृष्ठ AC पर आपतित होती है तथा कोण e ( निर्गत कोण ) पर पारगमित होती है । आपतित किरण PQ को आगे बढ़ाने पर तथा निर्गत किरण RS को पीछे बढ़ाने पर दोनों G बिन्दू पर मिलती है और इन दोनों किरणों के बीच बना कोण विचलन कोण कहलाता है । इसे से प्रदर्शित करते है ।
इस प्रकाश प्रिज्म से प्रकाश का अपवर्तन होता है ।
⦁ प्रिज्म द्वारा प्रकाश का वर्ण विक्षेपण(परिक्षेपण)-

न्यूटन के अनुसार सूर्य का प्रकाश कई रंगों के प्रकाश से मिलकर बना होता है । जब श्वेत प्रकाश की कोई बारीक किरण पुंज किसी प्रिज्म से होकर गुजारी जाती है तो प्रिज्म के दूसरी ओर रखे सफेद पर्दे पर प्रकाश की एक रंगीन पट्टी दिखाई देती है । इस रंगीन पट्टी को प्रकाश का स्पेक्ट्रम कहते है । इस स्पेक्ट्रम में ऊपरी सिरा लाल तथा निचला सिरा बैंगनी होता है और शेष रंग (नीला, आसमानी , हरा ,जामुनी, पीला) इनके बीच में अविरतता से फैले होते है ।
इस प्रकाश प्रिज्म से होकर श्वेत प्रकाश के गुजरने पर उसका अपने अवयवी रंगों में विभाजित होने की प्रकाशिक घटना को , प्रकाश का वर्ण विक्षेपण कहते है ।
⦁ श्वेत प्रकाश के स्पेक्ट्रम का पुनर्योजन-

चित्रानुसार जब दो प्रिज्मों को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है कि उनके फलक समान्तर हो जाए । जब पहले प्रिज्म से श्वेत प्रकाश गुजरता है तो यह रंगीन स्पेक्ट्रम बनाता है और यदि इस स्पेक्ट्रम को उल्टे रखे प्रिज्म से गुजारते है तो पुनः श्वेत प्रकाश प्राप्त होता है ,इसे ही श्वेत प्रकाश के स्पेक्ट्रम का पुनर्योजन कहते है ।
⦁ इद्रधनुष का बनना-

इंद्रधनुष ,वर्षा के पश्चात आकाश में वर्षा की बूँदों में दिखाई देने वाला प्राकृतिक स्पेक्ट्रम है । जब प्रकाश चित्रानुसार वर्षा की बूँद में प्रवेश करता है तो यह अपवर्तित व विक्षेपित (अलग-अलग रंगों में बंटना ) होता है । अब यह वर्षा की बूँद के आन्तरिक पृष्ठ से टकराता है और इसका आन्तरिक परावर्तन होता है । अब यह वर्षा की बूँद से बाहर निकलते समय पुनः अपवर्तित होता है और प्रेक्षक को इन्द्रधनुष दिखाई देता है । इन्द्र धनुष देखने के लिए पीठ को सूर्य की ओर होना चाहिए ।
⦁ तारों का टिमटिमाना-

जब तारों का प्रकाश पृथ्वी के वायुमण्डल में प्रवेश करता है तो इसका लगातार अपवर्तन होता रहता है ,क्योंकि ऊपरी वायुमण्डल से नीचे पृथवी सतह तक परतों की संघनता अथवा घनत्व बढ़ता जाता है । अतः तारे के प्रकाश का अनेक बार अपवर्तन होने के कारण वह अभिलम्ब की ओर झुकता या मुड़ता जाता है । जिससे तारे की आभासी स्थिति बनती है जो वास्तविक स्थिति से कुछ ऊँचाई पर प्रतीत होती है और क्षितिज से देखने पर तारे टिमटिमाते हुए प्रतीत होते है ।
⦁ अग्रिम सूर्योदय तथा विलंबित सूर्यास्त-

वायुमण्लीय अपवर्तन के कारण सूर्य हमें वास्तविक सूर्योदय से लगभग 2 मिनिट पूर्व दिखाई देने लगता है तथा वास्तविक सूर्यास्त के लगभग 2 मिनिट पश्चात तक दिखाई देता है । वास्तविक सूर्योदय से तात्पर्य सूर्य द्वारा वास्तव में क्षितिज को पार करना है तथा वास्तविक सूर्यास्त का तात्पर्य सूर्य का क्षितिज के नीचे जाना है । वास्तविक सूर्योदय व आभासी सूर्योदय अथवा वास्तिक सूर्यास्त व आभासी सूर्यास्त के बीच का समय अंतराल लगभग दो मिनिट होता है । इस प्रकार दिन की अवधि में 4 मिनिट की वृद्धि हो जाती है । इसी परिघटना के कारण ही सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सूर्य की चक्रिका चपटी प्रतीत होती है ।
⦁ प्रकाश का प्रकीर्णन-

जब प्रकाश की किरणें किसी वस्तु से टकराकर अपनी दिशा बदल लेती है परन्तु परावर्तन के नियमों का पालन नहीं करती हैं तो इस प्रकाशिक घटना को प्रकाश का प्रकीर्णन कहते है । टिण्डल नामक वैज्ञानिक ने इसकी खोज की ,इसलिए इसे टिण्डल प्रभाव भी ककहते है ।
⦁ आकाश का रंग नीला होना –

जब सूर्य का श्वेत प्रकाश वायुमण्डल से गुजरता है तो वायु के अणु छोटी की किरणों (जैसे नीली, बैंगनी ) का प्रकीर्णन अधिक मात्रा में करते है जबकी बड़ी वाली लाल रंग की प्रकाश किरणों का प्रकीर्णन कम मात्रा में होता है । अतः प्रकीर्णन के पश्चात नीली व बैंगनी रंग की प्रकाश किरणें पृथ्वी तक अधिक मात्रा में पहुँचती है । जिसके कारण ऊपर का आकाश नीला दिखाई देता है ।
यदि पृथवी के चारों ओर वायुमण्डल नहीं होता तो प्रकीर्णन ना होने के कारण आकाश काला दिखाई देता ।
⦁ उगते व छिपते सूर्य का लाल (रक्ताभ) दिखाई देना –

सूर्योदय व सूर्यास्त के समय प्रकाश की किरणें अधिक दूरी तय करके हमारी आँख तक पहुँचती है । इन किरणों के मार्ग में धूल के कणों तथा वायु अणुओं द्वारा प्रकाश किरणों का अधिक प्रकीर्णन होता है ।
इस प्रकीर्णन के कारण नीली व बैंगनी किरणें निकल (बिखर) जाती है क्योंकि इनका प्रकीर्णन सबसे अधिक होता है । इस प्रकार हमारी आँख तक लाल किरणें ही पहुँच पाती है । फलस्वरूप सूर्य उदय व अस्त होते समय लाल दिखाई देता है ।

क्लास-10 अध्याय -12 विद्युत (electricity)

  

क्लास-10 अध्याय -12 विद्युत (electricity)



  • विद्युत अवयव और उनके प्रतीक

⦁ विद्युत परिपथ-
किसी विद्युत धारा के सतत तथा बंद पथ को विद्युत परिपथ कहते है ।

⦁ विद्युत धारा-
विद्युत आवेश के प्रवाह की दर को विद्युत धारा कहते है । इसे I से व्यक्त करते है । इसका मात्रक एम्पियर होता है ,जो आंद्रे-मेरी एम्पियर नामक वैज्ञानिक के सम्मान में रखा गया है ।

अथवा
एकांक समय(इकाई समय) में प्रवाहित आवेश की मात्रा को विद्युत धारा कहतेहै ।
 धनावेश के प्रवाह की दिशा को विद्युत धारा की दिशा माना जाता है ।
 एक कूलॉम (C) आवेश लगभग 6 ×1018 इलेक्ट्रोनों में समाए आवेश के तुल्य होता है । और एक इलेक्ट्रोन पर आवेश 1.6× 10-19 C होता है ।
एक कूलॉम = 6 ×1018 ×1.6 10-19 C
= 6 ×1.6 ×10-1
= 9.6× 10-1
= 0.96 C
⦁ एमीटर –

विद्युत धारा मापने के लिए जिस यंत्र का उपयोग किया जाता है ,उसे एमीटर कहते है । इसे सदैव परिपथ में श्रेणीक्रम में लगाते है ।
⦁ Q. किसी विद्युत बल्ब के तंतु में से 0.5 A विद्युत धारा 10 मिनिट तक प्रवाहित होती है । विद्युत परिपथ से प्रवाहित विद्युत आवेश का परिमाण ज्ञात किजिए ?
Ans. दिया है –
विद्युत धारा = 0.5 A
समय = 10 मिनिट
         = 60 ×10 = 600 सैकंण्ड

⦁ विद्युत धारा के मात्रक के परिभाषा –
जब किसी विद्युत परिपथ मे एक कूलॉम(C) आवेश एक सैकण्ड(Sec.) तक प्रवाहित होता है तो उसमें बहने वाली धारा का मान एक एम्पीयर(A) होता है ।

⦁ विद्युत विभवांतर-
एकांक आवेश( Q) को विद्युत परिपथ में एक बिन्दू से दूसरे बिन्दू तक ले जाने में किया गया कार्य(W) विद्युत विभवांतर के बराबर होता है ।

अथवा
दो आवेशित चालकों के विद्युत विभवों के अन्तर को विद्युत विभवांतर कहते है ।

⦁ विद्युत विभव-
एकांक आवेश को अनन्त से विद्युत परिपथ या विद्युत क्षेत्र में किसी बिन्दू तक लाने में किया गया कार्य विद्युत विभव के बराबर होता है ।

a. विद्युत विभव या विद्युत विभवांतर का SI मात्रक वोल्ट होता है जिसे V से लिखते है ।
b. कार्य का SI मात्रक जूल होता है जिसे J से लिखते है ।
c. आवेश का SI मात्रक कूलॉम होता है जिसे C से लिखते है ।

⦁ वोल्टमीटर-
विद्युत परिपथ में विभव या विभवांतर मापने के लिए जिस यंत्र या उपकरण का उपयोग किया जाता है उसे वोल्टमीटर कहते है । वोल्टमीटर को सदैव उन बिन्दूओं से समांतर क्रम में संयोजित करते है जिनके बीच विभवांतर मापना है ।

Q. 12 V विभवांतर के दो बिन्दूओं के बीच 2 C आवेश को ले जाने में किया गया कार्य ज्ञात करें ।
Ans. दिया है- विभवांतर = 12 V
                       आवेश = 2 C


 ओम का नियम-
यदि भौतिक अवस्थाओं जैसे ताप , दाब, आयतन आदि को नियत रखा जाए तो विद्युत परिपथ में धातु के तार के दो सिरों के बीच विभवांतर उसमें प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा के समानुपाती होता है । इसे ही ओम का नियम कहते है । इस नियम को भौतिकविज्ञानी जार्ज साईमन ओम ने दिया था ।

⦁ प्रतिरोध के मात्रक की परिभाषा-
यदि किसी चालक अथवा धातु के तार के दोनों सिरों के बीच विभवांतर 1V है तथा उससे प्रवाहित विद्युत धारा का मान 1A है तो उस चालक का प्रतिरोध 1 Ω होगा ।

⦁ परिवर्ती प्रतिरोध या धारा नियंत्रक-
विद्युत परिपथ में प्रतिरोध को परिवर्तित करने के लिए एक अवयव अथवा युक्ति का उपयोग किया जाता है , जिसे परिवर्ती प्रतिरोध कहते है ।
परिवर्ती प्रतिरोध के द्वारा विद्युत परिपथ में विद्युत स्रोत (बैट्री) की वोल्टता बदले बिना ही धारा का नियंत्रण किया जा सकता है ,अतः इसे धारा नियंत्रक भी कहते है ।

Q. (a)यदि किसी विद्युत बल्ब के तंतु का प्रतिरोध 1200 Ω है तो यह 220 V स्रोत से कितनी विद्युत धारा लेगा ?(b) यदि किसी विद्युत हीटर की कुंडली का प्रतिरोध 100 Ω है तो यह विद्युत हीटर 220 V स्रोत से कितनी धारा लेगा ?
Ans.

Q. जब कोई विद्युत हीटर विद्युत स्रोत से 4 A विद्युत धारा लेता है तब उसके टर्मिनलों (सिरों) के बीच विभवांतर 60 V है । उस समय विद्युत हीटर कितनी विद्युत धारा लेगा जब विभवांतर को 120 V तक बढ़ा दिया जाए ।
Ans.

⦁ चालक पदार्थ के प्रतिरोध की निर्भरता-
चालक पदार्थ का प्रतिरोध(R) निम्न बातों पर निर्भर करता है –
1. चालक पदार्थ की लंबाई (l)के समानुपाती होता है ।
2. चालक पदार्थ की अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल(A) के व्युत्क्रमानुपाती होता है ।
3. चालक पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर करता है ।

Q. किसी धातु के 1 मीटर लंबे तार का 20 C पर वैद्युत प्रतिरोध 26 Ω है । यदि तार का व्यास 0.3 mm है , तो इस धातु के तार की वैद्युत प्रतिरोधकता ज्ञात करें ।
Ans.

Q. दिए गए पदार्थ के किसी l लंबाई तथा A मोटाई के तार का प्रतिरोध 4 Ω है । इसी पदार्थ के किसी अन्य तार का प्रतिरोध क्या होगा जिसकी लंबाई l/2 तथा मोटाई 2A है ?
Ans.


 कुछ महत्वपूर्ण बिन्दू-
1. किसी पदार्थ का प्रतिरोध तथा प्रतिरोधकता ताप परिवर्तन के साथ परिवर्तित हो जाते है ।
2. धातु तथा मिश्रधातुओं के लिए प्रतिरोधकता अत्यंत कम 10-8 से 10-6 Ωm तथा विद्युतरोधी पदार्थ ( रबड़, काँच ) के लिए बहुत उच्च 1012 से 1017 Ωm कोटी की होती है ।
3. विद्युत बल्बों के तंतुओं के निर्माण में एकमात्र धातु टंगस्टन (W) का ही उपयोग किया जाता है । जबकी कॉपर(Cu) तथा एल्युमिनियम(Al) उपयोग विद्युत संचरण के लिए उपयोग होने वाले तारों के निर्माण में किया जाता है ।
⦁ प्रतिरोधों का संयोजन- यह निम्न प्रकार का होता है ।
श्रेणीक्रम संयोजन –
जब प्रतिरोधों का एक सिरा दूसरे सिरे से मिलाकर जोड़ा जाता है तो इसे श्रेणीक्रम संयोजन कहते है । श्रेणीक्रम संयोजन में प्रत्येक प्रतिरोध में समान धारा प्रवाहित होती है ,परंतु प्रत्येक प्रतिरोध के सिरों पर विभवांतर भिन्न-भिन्न होता है ।

Veq = V1 + V2 + V3                                       ( V = I R )
I Req = I R1 + I R2 + I R3
I Req = I ( R1 + R2 + R3 )
Req = R1 + R2 + R3

Q. एक विद्युत लैम्प जिसका प्रतिरोध 20 Ω है , तथा एक 4 Ω प्रतिरोध का चालक 6 V बैट्री से श्रेणीक्रम में जुड़े है । a. परिपथ का कुल प्रतिरोध , b. परिपथ में प्रवाहित धारा तथा c. विद्युत लैम्प व चालक के सिरों के बीच विभवांतर परिकलित कीजिए ।
Ans.

a. परिपथ का कुल प्रतिरोध
Req = R1 + R2
Req = 4 + 20
Req = 24 Ω

b. Veq = I Req

C. चालक के सिरों पर विभवांतर
V1 = I R1

Q. किसी विद्युत परिपथ का व्यवस्था आरेख खींचिए जिसमें 2 V के तीन सेलों की बैट्री , एक 5 Ω प्रतिरोधक, एक 8 Ω प्रतिरोधक ,एक 12 Ω प्रतिरोधक तथा एक प्लग कुंजी सभी श्रेणीक्रम में संयोजित है । साथ ही कुल प्रतिरोध , परिपथ में प्रवाहित धारा तथा प्रत्येक प्रतिरोध के सिरों पर विभवांतर ज्ञात करो ।
Ans.

कुल प्रतिरोध Req = R1 + R2 + R3 
Req = 5 + 8 + 12
Req = 25 Ω

परिपथ में प्रवाहित कुल धारा 

विद्युत परिपथ में प्रतिरोधों के सिरों पर विभवांतर

समांतर क्रम संयोजन (पार्श्व क्रम संयोजन) –
जब प्रतिरोधों को समांतर क्रम या पार्श्व क्रम में संयोजित करते है तो इसे समांतर क्रम संयोजन (पार्श्व क्रम संयोजन) कहते है । समांतर क्रम संयोजन में प्रत्येक प्रतिरोध के सिरों पर विभवांतर समान होता है परन्तु उनमें धारा भिन्न-भिन्न होती है ।



जब दो प्रतिरोध समांतर क्रम में जुड़े हो तो कुल प्रतिरोध का सूत्र

Q. प्रतिरोधकों R1 , R2 तथा R3 जिनके मान क्रमशः 5 Ω ,10 Ω तथा 30 Ω है , इन्हें समान्तर क्रम में 12 V की बैट्री से जोड़ा गया है । a. प्रत्येक प्रतिरोध से प्रवाहित धारा b. परिपथ में प्रवाहित कुल विद्युत धारा c. परिपथ का कुल प्रतिरोध ज्ञात कीजिए ।
Ans.

a. प्रत्येक प्रतिरोध से प्रवाहित धारा
प्रथम प्रतिरोध(R1) से प्रवाहित धारा

b. परिपथ में प्रवाहित कुल विद्युत धारा
Ieq = I1 + I2 + I3
Ieq = 2.4 + 1.2 + 0.4
Ieq = 4 A
c. परिपथ का कुल प्रतिरोध

Q.


उपरोक्त चित्र के आधार पर परिपथ का कुल प्रतिरोध तथा परिपथ में प्रवाहित कुल विद्युत धारा ज्ञात कीजिए ।
Ans.

परिपथ का कुल प्रतिरोध

अथवा


⦁ महत्वपूर्ण बिन्दू
a. श्रेणीबद्ध परिपथ से एक प्रमुख होनि यह होती है कि जब परिपथ का एक अवयव कार्य करना बंद कर देता है तो परिपथ टूट जाता है और परिपथ का अन्य कोई अवयव कार्य नहीं कर पाता है ।
इसके विपरीत यदि समांतर क्रम संयोजन में कोई अवयव खराब होता है तो अन्य अवयव पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है और अन्य अवयव समान रूप से कार्य करते रहते है ।

b.प्रतिरोधों का जब श्रेणीक्रम संयोजन करते हैं तो कुल प्रतिरोध बढ़ता है और जब समांतर क्रम संयोजन करते है तो प्रतिरोध घटता है ।


जूल का नियम या जूल का उष्मीय प्रभाव या विद्युत धारा का तापीय प्रभाव –
जूल के अनुसार किसी विद्युत परिपथ में यदि R प्रतिरोध में I धारा को t समय के लिए प्रवाहित किया जाए तो चालक तार गर्म होने लगता है अर्थात् वहाँ उष्मा उत्पन्न होने लगती है ।

जूल के अनुसार उत्पन्न उष्मा H निम्न कारकों पर निर्भर करती है ।

उष्मा का मात्रक जूल या कैलोरी होता है । उष्मा का SI मात्रक जूल होता है जिसे J से लिखते है ।

Q. किसी 4 Ω प्रतिरोधक से प्रति सैंकण्ड 5 A की धारा प्रवाहित हो रही है तो प्रतिरोधक से उत्पन्न उष्मा की गणना करे ।
Ans. दिया है –
R = 4 Ω
I = 5 A
t = 1 Sec.
H = I2 R t
H = (5)2 ×4 ×1
H = 25× 4 ×1
H= 100 J
Q. किसी 8 Ω प्रतिरोधक से प्रति सैंकण्ड 200 J उष्मा उत्पन्न हो रही है । प्रतिरोध के सिरों पर उत्पन्न विभवांतर ज्ञात कीजिए ।
Ans. दिया है –
R = 8 Ω
H = 200 J
t = 1 Sec.

विभवांतर ( V ) = I R
V = 5 ×8
V = 40 volt

⦁ विद्युत धारा के तापीय प्रभाव या जूल के नियम के व्यावहारिक अनुप्रयोग (उपयोग)
1. विद्युत इस्तरी , विद्युत टोस्टर, विद्युत तंदूर ,विद्युत केतली तथा विद्युत हीटर आदि विद्युत धारा के तापीय प्रभाव पर आधारित है ।
2. विद्युत तापीय प्रभाव का उपयोग प्रकाश उत्पन्न करने में किया जाता है । जैसे बल्बों से प्रकाश उत्पन्न करना । बल्ब के तंतुओं को बनाने के लिए टंगस्टन ( गलनांक 3380 डिग्री सेल्सियस) धातु का प्रयोग करते है । बल्बों में रासायनिक दृष्टि से अक्रिय नाइट्रोजन तथा ऑर्गन गैस भरी जाती है जिससे उसके तंतु की आयु में वृद्धि हो जाती है ।
3. विद्युत परिपथों में उपयोग होने वाले फ्यूज भी तापीय प्रभाव पर आधारित होते है । निम्न गलनांक वाली धातुओं का उपयोग फ्यूज बनाने में किया जाता है । इसे विद्युत परिपथ में श्रेणीक्रम में संयोजित करते है । यदि विद्युत परिपथ में धारा का मान अधिक होता है तो फ्यूज पिघल जाता है और धारा परिपथ में प्रवाहित होना बंद हो जाती है जिससे विद्युत उपकरण खराब होने से बच जाते है ।



⦁ विद्युत शक्ति-
किसी विद्युत परिपथ में सेल द्वारा R प्रतिरोध में I धारा को निरन्तर प्रवाहित करने में किए गए कार्य की दर को विद्युत शक्ति कहते है । इसे P से प्रदर्शित करते है ।
अथवा
कार्य करने की दर को शक्ति कहते है ।

शक्ति का SI मात्रक ‘ वॉट(Watt) ‘ होता है । जिसे हम W से लिखते है ।
वॉट शक्ति का छोटा मात्रक होता है अतः हम वास्तविक व्यवहार में हम शक्ति के काफी बड़े मात्रक किलोवॉट (KW) का उपयोग करते है ।
1KW = 1000 Watt
⦁ मात्रक वॉट की परिभाषा –
जब किसी युक्ति में 1 A धारा 1 Volt पर प्रवाहित की जाती है तो युक्ति की शक्ति 1 वॉट होती है ।
P = V I
P = 1× 1
P = 1 Watt
⦁ विद्युत ऊर्जा-
शक्ति तथा समय के गुणनफल को विद्युत ऊर्जा कहते है ।
विद्युत ऊर्जा = शक्ति(P) ×समय(t)
इसका मात्रक W h (वॉट घंटा) होता है । इसका व्यापारिक मात्रक किलोवॉट घंटा (KWh) होता है जिसे सामान्य बोलचाल में ‘ यूनिट ‘ भी कहते है ।
1 यूनिट = 1 KWh
         = 1000 W ×3600 सैंकण्ड
1 यूनिट = 3.6 ×106 J
विद्युत ऊर्जा का SI मात्रक जूल होता है जिसे J से लिखते है ।
Q. कोई विद्युत बल्ब 220 V के जनित्र से संयोजित है । यदि बल्ब से 0.5 A विद्युत धारा प्रवाहित होती है तो बल्ब की शक्ति क्या है ।
Ans. दिया है –
विभवांतर(V) = 220 Volt
विद्युत धारा (I) = 0.5 A
विद्युत शकित (P) = V I
                P = 220 ×0.5
                 P = 110 W

Q. एक घर में 400 W का रेफ्रीजरेटर ,200 W की टी.वी. , 150 W का पंखा और 50 W का बल्ब लगा है । ये सभी उपकरण प्रतिदिन 8 घंटे चलते है । 3.00 रूपये प्रति KWh(यूनिट) की दर से इन्हें 30 दिन तक चलाने के लिए विद्युत ऊर्जा का मूल्य क्या है ।
Ans. कुल विद्युत शक्ति (P) = 400 W + 200 W + 150 W + 50 W
                                  P = 800 W
                                   P = 0.800 K W (किलोवॉट)
कुल समय (t)= 8× 30 = 240 घंटे

विद्युत ऊर्जा = P ×t
                  = 0.800 ×240 KWh
                 = 192 KWh (192 यूनिट)
विद्युत ऊर्जा का मूल्य
एक यूनिट का मूल्य = 3 रूपये
192 यूनिट का मूल्य = 3 ×192 = 576 रूपये

Q. कोई विद्युत मोटर 220 V के विद्युत स्रोत से 5 A विद्युत धारा लेता है । मोटर की शक्ति निर्धारित कीजिए तथा 2 घंटे में मोटर द्वारा उपभुक्त ऊर्जा परिकलित कीजिए ।
Ans. दिया है
विभवांतर (V) = 220 Volt
विद्युत धारा (I) = 5 A
समय = 2 घंटे
विद्युत शक्ति (P) = V ×I
P = 220× 5
P = 1100 W
P = 1.100 KW
विद्युत ऊर्जा = P× t
                   = 1.100× 2
                  = 2.200 KWh
                   = 2.2 KWh ( 2.2 यूनिट)